BIG NEWS: कोर्ट ने पाई NDPS मामले में गंभीर लापरवाही, जिला लोक अभियोजक के आवेदन पर लिया संज्ञान, एसपी को 7 दिन में दोषी पुलिस अधिकारियों पर कार्यवाही करने के दिए आदेश, कौन से थाने का है मामला, पढ़े खबर

कोर्ट ने पाई NDPS मामले में गंभीर लापरवाही, जिला लोक अभियोजक के आवेदन पर लिया संज्ञान, एसपी को 7 दिन में दोषी पुलिस अधिकारियों पर कार्यवाही करने के दिए आदेश, कौन से थाने का है मामला, पढ़े खबर

BIG NEWS: कोर्ट ने पाई NDPS मामले में गंभीर लापरवाही, जिला लोक अभियोजक के आवेदन पर लिया संज्ञान, एसपी को 7 दिन में दोषी पुलिस अधिकारियों पर कार्यवाही करने के दिए आदेश, कौन से थाने का है मामला, पढ़े खबर

नीमच। जिले में मादक पदार्थों की प्रकरण में पुलिस द्वारा किस प्रकार लापरवाही की जाती है, एवं आरोपियों को फायदा पहुंचाने के लिए किस लापरवाही से अनुसंधान किया जाता है। उसको लेकर पहली बार विशेष न्यायाधीश एनडीपीएस कोर्ट माननीय विवेककुमार  द्वारा गंभीर लापरवाही मानते हुए पुलिस अधीक्षक नीमच को सात दिवस के भीतर लापरवाह पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई कर प्रतिवेदन कोर्ट को सौंपने हेतु आदेशित किया है।

मामला नीमच सिटी थाने का है। जिसमे अपराध क्रमांक 358/20 में पुलिस ने बबलू नामक आरोपी को 28 किलो अफीम के साथ गिरफ्तार किया गया था। जिसमे प्राथमिक अनुसंधान थाना प्रभारी नरेन्द्र सिंह ठाकुर ने किया, एवं आगे की जांच जीरन थाना प्रभारी राजेश चौहान द्वारा की गई। जिसमें जांचकर्ताओं ने आरोपी बबलू का धारा 27 का मेमो दिनांक 11.9.20 को कथन दिया लिया गया। जिसमें बबलू द्वारा 4 अन्य सह आरोपियों के नाम व पते बताए गए, जांच के दौरान उक्त मेमो पर कोर्ट द्वारा मुहर लगाई जा चुकी थी। 

बाद में चालन डायरी में उक्त मेमो गायब मिला, तो जिला लोक अभियोजक मनीष जोशी द्वारा प्रकरण में अनियमितता को लेकर एक आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत किया गया। जिस पर न्यायालय द्वारा अलग से अलग से एमजेसी 13/21 कायम करते हुए पाया कि प्रकरण में 11.9.2020 लिया गया मेमो गायब मिला और उसकी जगह एक दूसरा मेमो दिनांक 13.9.2021 का मेमो पाया गया। जिसमे बबलू द्वारा 7 आरोपियो के नाम बताए गए, और विडम्बना ये रही कि इन 7 से में 3 आरोपियों के नाम वही थे, जो पुराने मेमो में थे। मगर इस बार उनके पते बदले हुए थे। साथ ही सभी आरोपियों को भागोड़े बताते हुए मात्र बबलू के खिलाफ चालान पेश किया गया। 

न्यायालय द्वारा 28 किलो अफीम की तस्करी के मामले में पुलिस द्वारा बिना न्यायालय की अंतिम मंजूरी के एवं  कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग कर 7 संदेही आरोपियों के नाम निकालने और उनके विरुद्ध बिना सही अनुसंधान किए, उन्हें दोषमुक करने के मामले में लोक अभियोजक मनीष जोशी  द्वारा मामला उठाया जाने पर एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुई। पुलिस अधीक्षक को आगे अनुसंधान करने के लिए आदेश दिया है। न्यायालय द्वारा लोक अभियोजक जैसे जिम्मेदार पदाधिकारी द्वारा पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठाए गए, सवाल को गंभीरता से लेते हुए पुलिस को अनुसन्धान विधि के पालन करने की हिदायत दी है।


 
प्रकरण में एक अभियुक्त द्वारा अपने बयान में अन्य 4 संदेहियो का नाम तस्करी में लिया गया था। उक्त बयान अभिलेख से गायब होने पर दोषी पुलिस वालो के विरुद्ध करवाही कर प्रतिवेदन अदालत में दाखिल करने के लिए भी पुलिस अधीक्षक नीमच को आदेशित किया जाता है। न्यायालय ने पुलिस द्वारा अपनाई गई प्रकिया जिसमे केस डायरी के माध्यम से ही मनमर्जी अनुसार संदेहियों के विरुद्ध केस का खात्मा  बिना न्यायालय की मंजूरी कर दिया। 

उक्त प्रक्रिया को गैर कानूनी करार देते हुए निर्णय में उक्त पहलू पर प्रकाश डालते हुए लेख किया की यदि किसी मामले के अन्वेषण के दौरान अन्वेषणकर्ता अधिकारी को विवेचन मामले में इतना पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलता है, जितने में मामले में न्यायालय के भीतर न्यायालय के समक्ष चालान (अंतिम प्रतिवेदन) धारा 170 दंड प्रकिया सहिंता के अंतर्गत संदेही को विचारण के लिए प्रस्तुत किया जा सके, तो ऐसे मामले में पुलिस खात्मा रिपोर्ट अंतर्गत धारा 169 दण्ड प्रकिया संहिता लगाती है। 

जिसमे भी अभियुक्त के विरुद किए गए अनुसंधान का ब्योरा एवं सामग्री होती है। उक्त दशा में भी जब साक्ष्य अपर्याप्त भी हो जब तक न्यायालय को मंजूरी नहीं मिलती है। तब तक प्रकरण में  खात्मा नहीं होता है। कोर्ट ने लिखा है कि ‘पुलिस का कानूनी कार्य है कि वो आपराधिक प्रक्रिया संहिता के तहत किसी अपराध की जांच करे. जांच पुलिस का विशेष विशेषाधिकार है, जिसमें सामान्यतः हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन यदि पुलिस कानून के मुताबिक अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं करती है, तो न्यायालय ये देखते हुए अपनी जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हट सकता कि जांच पुलिस का विशेषाधिकार है।

न्यायालय ने आगे कहा, ‘यदि पेश किए गए दस्तावेजों से कोर्ट संतुष्ट हो जाता है कि पुलिस ने मामले में सही से जांच नहीं की है तो यह कोर्ट का दायित्व है कि वह मामले में कानून के मुताबिक जांच सुनिश्चित करे. यदि इसे लेकर कोर्ट कोई निर्देश देता है तो यह जांच में हस्तक्षेप करना नहीं होगा।