EXCLUSIVE: एशिया की सबसे बड़ी मानव निर्मित झील गांधीसागर बांध ने पूरे किए 60 साल, किसके जन्मदिन पर हुआ लोकार्पण, जाने भूमिपूजन से लेकर आज तक का इतिहास

एशिया की सबसे बड़ी मानव निर्मित झील गांधीसागर बांध ने पूरे किए 60 साल, किसके जन्मदिन पर हुआ लोकार्पण, जाने भूमिपूजन से लेकर आज तक का इतिहास

EXCLUSIVE: एशिया की सबसे बड़ी मानव निर्मित झील गांधीसागर बांध ने पूरे किए 60 साल, किसके जन्मदिन पर हुआ लोकार्पण, जाने भूमिपूजन से लेकर आज तक का इतिहास

मंदसौर। अपने निर्माण के समय एशिया की सबसे बड़ी मानव निर्मित झील गांधीसागर बांध ने शुक्रवार को 60 साल पूरे कर लिए हैं। छह साल में बनकर तैयार हुए बांध का भूमिपूजन और लोकार्पण दोनों ही तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने किए थे। लोकार्पण के लिए पं. नेहरू ने 19 नवंबर 1960 का दिन इंदिरा गांधी का जन्मदिन होने के कारण ही चुना था। गांधीसागर बांध पर बना बिजलीघर अभी अपनी क्षमता से नहीं चल रहा है। इसकी कुल क्षमता 115 मेगावॉट है। पर अभी 23-23 मेगावॉट क्षमता की दो टरबाइन ही चल रही है।

मप्र की प्रमुख चंबल नदी पर बने गांधीसागर बांध की पूर्ण भराव क्षमता 1313 फीट है। इसमें कुल 19 (9 बड़े और 10 छोटे) गेट हैं। बांध से एकसाथ लगभग 5.50 लाख क्यूसेक (क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड) पानी छोड़ा जा सकता है। गांधीसागर बांध से जुड़ी कई बातें तो अब तक लोगों को बताई जा चुकी है। अभी इस नई बात का खुलासा हुआ है कि गांधीसागर बांध का लोकार्पण 19 नवंबर को क्यों हुआ था। 

दरअसल 19 नवंबर 1960 को लोकार्पण की तारीख तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसलिए तय की थी कि उनकी पुत्री इंदिरा गांधी का जन्मदिन था। बाद में आगे चलकर इंदिरा गांधी भी देश की शक्तिशाली प्रधानमंत्री बनी। मंदसौर जिले से राजस्थान की लगती हुई सीमा के पास ही 7 मार्च 1954 को गांधीसागर बांध की आधारशिला तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने रखी थी। यहां 1957 में बिजलीघर का काम शुरू हुआ था। नवंबर 1960 में बिजली उत्पादन और इसका वितरण शुरू हुआ।

204 गांव पूरे डूबे, 150 गांव आंशिक डूब में आए-

गांधीसागर बांध और पावर स्टेशन के निर्माण में लगभग 18.40 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। बिजलीघर 65 मीटर लंबा और 56 फीट चौड़ा है। पहले गांधीसागर बांध पर नियमित बिजली उत्पादन होता था। कुछ वर्षों से जरूरत होने पर ही बिजली उत्पादिन की जाती थी। 2019 में हुई अतिवृष्टि के चलते बांध में क्षमता से ज्यादा पानी आने से वह ऊपर से बिजलीघर में घुस गया था इसकी पांचों टरबाइन खराब भी हो गई है

अब जाकर दो ठीक हुई है। बांध की ऊंचाई 204 फीट, निर्माण के दौरान अविभाजित मंदसौर जिले के 204 गांव डूब में आए थे। 150 गांव आंशिक डूब में आए हैं। वहीं रामपुरा को बचाने के लिए रिंगवॉल बनाई गई थी वह भी 2019 की अतिवृष्टि में क्षतिग्रस्त हो गई थी। रामपुरा के निचले हिस्से में भरे पानी को बाहर निकालने में लगभग 10 दिन लग गए।

कम व्यय और समय सीमा में बना था बांध, पद्यश्री से किया था सम्मानित-

बांध जल संसाधन विभाग के तत्कालीन चीफ इंजीनियर एके चाहर, अधीक्षण यंत्री सीएच सांघवी, सिविल शिवप्रकाशम इलेक्ट्रिक के मार्गदर्शन में बना था। बांध की गुणवत्ता भी काफी अच्छी थी और यह एशिया में सबसे कम व्यय 18.40 करोड़ रुपए में बनकर तैयार हुआ था। बांध के समय सीमा में पूर्ण होने पर चीफ इंजीनियर चाहर को पद्मश्री की उपाधि से सम्मानित भी किया गया था। बांध का मॉडल खडग्वासला रिसर्च इंस्टीट्यूट पुणे ने बनाया था।

चंबल वैली परियोजना के तहत बने थे चार बांध-

महू के पास जानापाव पहाड़ी से निकली चंबल नदी मप्र राजस्थान व उप्र में लगभग 960 किमी का सफर तय कर यमुना नदी में मिलती है। प्रारंभ में मंदसौर जिले में बनने वाले बांध को चंबल घाटी परियोजना नाम दिया गया था। इसे चार चरणों में पूरा किया जाना था प्रथम चरण में गांधीसागर, दूसरे चरण में रावतभाटा में राणा प्रताप सागर और तीसरे चरण में कोटा के पास जवाहर सागर व चौथे चरण में कोटा बैराज बनाए गए। पहले तीन बांधों से विद्युत उत्पादन और चौथे से सिंचाई का लक्ष्य रखा गया था। कुल मिलाकर इंटरनेशनल कंट्रोल बोर्ड के निर्देशन में मप्र राजस्थान की धरती को सिंचित करने का भारत विकास प्राधिकरण का यह दूसरा सपना पूरा हुआ।

2019 में खतरा बन गया था गांधीसागर बांध-

अपने निर्माण के बाद से कई बार ज्यादा बरसात भी हुई और अनुमान से ज्यादा पानी भी गांधीसागर बांध में आया पर सितंबर 2019 में हुई अतिवृष्टि और अधिकारियों की लापरवाही ने गांधीसागर बांध को खतरे के मुंह पर खड़ा कर दिया था। 14-15 सितंबर 2019 की दरमियानी रात में मंदसौर, इंदौर, उज्जैन, रतलाम, प्रतापगढ़ व नीमच जिले में लगातार हुई बारिश के चलते बांध में पानी की आवक 19 लाख क्यूसेक तक पहुंच गई थी। बांध से पानी निकलने की क्षमता केवल 5.50 क्यूसेक होने से बेकवॉटर लगभग 150 गांवों में घुस गया। 

वहीं नीमच जिले के रामपुरा में भी बांध बनने के बाद पहली बार पानी घुस गया जो काफी दिनों बाद निकला। इधर बांध का जलस्तर 1321 फीट तक पहुंचने के बाद पानी ऊपर से निकलकर बिजलीघर में घुस गया। वहां की सभी टरबाइन भी खराब हो गई है जो अभी भी इनमें से केवल दो ही सुधर पाई है।

बांध को कुछ होता तो कोटा व रावतभाटा बह जाते- 

गांधीसागर बांध क्षतिग्रस्त होता तो इससे राजस्थान का प्रमुख शहर कोटा व रावतभाटा पूरी तरह बह जाते। बांध में भरी अथाह जलराशि रावतभाटा के परमाणु बिजलीघर को भी तबाह कर देती। हालांकि उस समय तो प्रदेश में मुख्य सचिव भी इस बात को नकारकर कह रहे थे कि बांध को 1325 फीट तक बढ़ने में कोई खतरा नहीं था। पर उसके एक माह बाद ही जिले के तत्कालीन प्रभारी मंत्री हुकुमसिंह कराड़ा ने शाजापुर में स्वीकार किया था कि गांधीसागर बांध के टूटने का खतरा बढ़ गया था।

गांधीजी की प्रतिमा पर किया माल्यार्पण व आरती- 

शुक्रवार को गांधीसागर में जल संसाधन विभाग के कार्यपालन यंत्री अरुणसिंह चौहान ने गांधीसागर बांध स्थल पर महात्मा गांधी की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया व चंबल नदी की आरती की। साथ ही बांध की 60 वर्ष की आयु पूरी होने पर कामना की कि बांध 100 वर्ष की आयु पूरी करे।