BIG NEWS : आज देशभर में रावण दहन की धूम, लेकिन इन 7 जगहों पर दशानन को लेकर हैरान कर देने वाली मान्यताएं! आखिर क्यों यहां नहीं दिखता दशहरे का आम नजारा?, जानने के लिए पढ़े पूरी खबर

BIG NEWS : आज देशभर में रावण दहन की धूम, लेकिन इन 7 जगहों पर दशानन को लेकर हैरान कर देने वाली मान्यताएं! आखिर क्यों यहां नहीं दिखता दशहरे का आम नजारा?, जानने के लिए पढ़े पूरी खबर

डेस्क । देशभर में आज विजयादशमी यानी दशहरा मनाया जा रहा है। इस दिन बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में भगवान श्रीराम द्वारा रावण वध की परंपरा का स्मरण किया जाता है। देश के अधिकांश हिस्सों में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है, लेकिन भारत में कुछ स्थान ऐसे भी हैं, जहां दशहरे पर रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। इन जगहों पर रावण को अलग-अलग मान्यताओं के आधार पर याद किया जाता है और कहीं उसकी पूजा-अर्चना भी की जाती है।

देश की सांस्कृतिक विविधता के बीच रावण को लेकर प्रचलित ये परंपराएं लोगों का ध्यान आकर्षित करती हैं। कहीं उसे अपने पूर्वजों से जोड़कर देखा जाता है, तो कहीं पारिवारिक रिश्ते के कारण सम्मान दिया जाता है। यही वजह है कि दशहरे के दिन इन स्थानों पर रावण दहन की परंपरा अन्य जगहों से अलग दिखाई देती है।

1. बिसरख गांव, उत्तर प्रदेश : रावण की जन्मस्थली मानकर होती है पूजा

उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा के पास स्थित बिसरख गांव को स्थानीय मान्यताओं में रावण की जन्मस्थली माना जाता है। मान्यता है कि इस स्थान का संबंध रावण के पिता ऋषि विश्रवा से है। इसी वजह से यहां के लोग रावण को केवल रामायण के खलनायक के रूप में नहीं देखते, बल्कि उसे विद्वान और भगवान शिव का भक्त मानकर सम्मान देते हैं। दशहरे के अवसर पर यहां रावण का पुतला जलाने के बजाय पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं।

 2. मंदसौर, मध्य प्रदेश : रावण को मानते हैं अपना दामाद

मध्य प्रदेश का मंदसौर रावण से जुड़ी अनूठी मान्यताओं के कारण देशभर में जाना जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, रावण की पत्नी मंदोदरी का संबंध मंदसौर क्षेत्र से था। इसी आधार पर यहां रावण को दामाद के रूप में सम्मान दिया जाता है। विशेषकर खानपुरा क्षेत्र में रावण की पूजा की परंपरा प्रचलित है। यहां कुछ लोग दशहरे पर रावण का पुतला जलाने के बजाय उसकी पूजा करते हैं। उनके लिए यह परंपरा पारिवारिक संबंधों और स्थानीय आस्था से जुड़ी हुई है।

3. रावनग्राम, मध्य प्रदेश : यहां रावण बाबा के नाम से पूजा

मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के पास स्थित रावनग्राम में भी रावण को लेकर विशेष धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। गांव में रावण की प्रतिमा स्थापित है और स्थानीय लोग उसे रावण बाबा के नाम से पुकारते हैं। यहां रावण को विद्वान और शिवभक्त के रूप में याद किया जाता है। दशहरे पर पुतला दहन करने के बजाय उसकी पूजा-अर्चना की जाती है। इस गांव की परंपरा देश के उन स्थानों में शामिल है, जहां रावण को देखने का नजरिया आम दशहरा आयोजनों से अलग है।

4. कानपुर, उत्तर प्रदेश : साल में एक बार खुलता है दशानन मंदिर

उत्तर प्रदेश के कानपुर के शिवाला क्षेत्र में स्थित दशानन मंदिर रावण की पूजा के लिए प्रसिद्ध है। बताया जाता है कि इस मंदिर के कपाट सालभर बंद रहते हैं और दशहरे के दिन श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोले जाते हैं। इस अवसर पर रावण की प्रतिमा का श्रृंगार किया जाता है और श्रद्धालु तेल के दीपक जलाकर पूजा-अर्चना करते हैं। यहां रावण को विद्वान और भगवान शिव का परम भक्त मानने की परंपरा है। मंदिर से जुड़ी यह मान्यता दशहरे पर रावण दहन की प्रचलित परंपरा से अलग पहचान रखती है।

5. जोधपुर और मंडोर, राजस्थान : रावण को पूर्वज मानकर करते हैं स्मरण

राजस्थान के जोधपुर और मंडोर क्षेत्र में भी रावण से जुड़ी विशिष्ट परंपराएं देखने को मिलती हैं। यहां कुछ ब्राह्मण परिवार स्वयं को रावण का वंशज मानते हैं। इन परिवारों के लिए रावण केवल रामायण का एक पात्र नहीं, बल्कि पूर्वज और विद्वान के रूप में भी महत्वपूर्ण है। दशहरे के दिन कुछ परिवार रावण दहन का उत्सव मनाने के बजाय श्राद्ध और पिंडदान जैसी परंपराओं के माध्यम से उसका स्मरण करते हैं। इस तरह यहां विजयादशमी के अवसर पर रावण को याद करने का तरीका अन्य स्थानों से अलग दिखाई देता है।

6. काकीनाडा, आंध्र प्रदेश : शिवभक्त रावण को दिया जाता है सम्मान

आंध्र प्रदेश के काकीनाडा में भी रावण से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं का उल्लेख मिलता है। यहां रावण को एक पराक्रमी शासक और भगवान शिव के परम भक्त के रूप में देखा जाता है। स्थानीय परंपराओं में उसकी शिवभक्ति और धार्मिक साधना को महत्व दिया जाता है। इसी कारण यहां रावण के प्रति सम्मान की भावना रखने वाली मान्यताएं प्रचलित हैं। हालांकि, इस क्षेत्र की सभी धार्मिक परंपराओं को एक जैसा मानना उचित नहीं होगा।

7. कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश : रावण की शिवभक्ति से जुड़ी मान्यता

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के बैजनाथ क्षेत्र का संबंध भगवान शिव और रावण की भक्ति से जुड़ी पौराणिक मान्यताओं से है। मान्यता है कि रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी। इसी वजह से यहां रावण की शिवभक्ति को विशेष महत्व दिया जाता है। बैजनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित है, लेकिन इससे जुड़ी पौराणिक कथाओं में रावण का भी उल्लेख मिलता है। इस क्षेत्र में प्रचलित मान्यताएं रावण के विद्वान और शिवभक्त स्वरूप को सामने लाती हैं।

अलग-अलग परंपराएं, एक ही त्योहार का विविध रूप विजयादशमी को सामान्य रूप से भगवान श्रीराम की रावण पर विजय और बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। देशभर में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन इसी परंपरा का प्रमुख हिस्सा है। वहीं, कुछ स्थानों पर स्थानीय धार्मिक मान्यताओं, पारिवारिक संबंधों और पौराणिक कथाओं के आधार पर रावण को सम्मान देने की परंपरा भी कायम है।

बिसरख से मंदसौर और रावनग्राम से जोधपुर तक रावण से जुड़ी इन मान्यताओं में विविधता दिखाई देती है। कहीं उसे दामाद, कहीं पूर्वज और कहीं भगवान शिव का परम भक्त माना जाता है। यही भारत की सांस्कृतिक विविधता की विशेषता है, जहां एक ही पर्व अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट परंपराओं के साथ मनाया जाता है।

नोट: इन स्थानों से जुड़ी मान्यताएं स्थानीय परंपराओं और धार्मिक विश्वासों पर आधारित हैं। सभी स्थानों पर रावण दहन नहीं होने की परंपरा एक जैसी या सर्वमान्य नहीं है।