NEWS: गाँधीसागर वन्यप्राणी अभयारण्य, नीमच–मंदसौर क्षेत्र में गिद्धों की उत्साहजनक वृद्धि, संयुक्त गणना में 1084 + 507 गिद्ध दर्ज, संरक्षण प्रयासों के मिले सकारात्मक परिणाम,पढ़े खबर

NEWS: गाँधीसागर वन्यप्राणी अभयारण्य, नीमच–मंदसौर क्षेत्र में गिद्धों की उत्साहजनक वृद्धि, संयुक्त गणना में 1084 + 507 गिद्ध दर्ज, संरक्षण प्रयासों के मिले सकारात्मक परिणाम,पढ़े खबर

मंदसौर/नीमच, मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले स्थित गाँधीसागर वन्यप्राणी अभयारण्य एक बार फिर गिद्धों के प्रमुख केंद्र के रूप में उभरा है। प्रदेशव्यापी गिद्ध गणना 2025-26 के तहत अभयारण्य क्षेत्र में कुल 1084 गिद्ध दर्ज किए गए।

गणना कार्य का निरीक्षण वन संरक्षक (CF) उज्जैन वृत्त, श्री आलोक पाठक एवं वनमंडलाधिकारी (DFO) मंदसौर, श्री संजय रायखेरे द्वारा किया गया। अधिकारियों ने बताया कि यह संख्या क्षेत्र में सुरक्षित आवास और प्रभावी संरक्षण प्रबंधन का प्रमाण है।


नीमच जिले में भी दिखी सकारात्मक तस्वीर

इसी क्रम में नीमच जिले में 20 से 22 फरवरी तक तीन दिवसीय शीतकालीन गिद्ध गणना अभियान चलाया गया। नीमच, मनासा, रामपुरा, जावद और रतनगढ़ वन क्षेत्रों में कुल 507 गिद्धों की उपस्थिति दर्ज की गई।

विशेष बात यह रही कि पहली बार गणना मोबाइल ऐप के माध्यम से की गई। इसमें प्रजाति, आवास, घोंसलों में शिशु, जल स्रोतों पर मौजूद गिद्धों आदि का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया गया।


स्थानीय और प्रवासी प्रजातियों का संगम

गाँधीसागर अभयारण्य और आसपास का क्षेत्र न केवल स्थानीय बल्कि प्रवासी गिद्धों का भी पसंदीदा ठिकाना बना हुआ है। गणना में निम्न प्रमुख प्रजातियाँ देखी गईं—

  • हिमालयन ग्रिफन

  • यूरेशियन ग्रिफन

  • सिनेरियस गिद्ध

  • व्हाइट-रम्प्ड वल्चर

  • इंडियन लॉन्ग-बिल्ड वल्चर

  • इजिप्शियन गिद्ध

प्रवासी गिद्ध तिब्बत, मध्य एशिया और हिमालय की ऊँचाइयों से शीतकाल में यहाँ पहुँचते हैं। ये सामान्यतः अक्टूबर-नवंबर में आते हैं और मार्च-अप्रैल तक निवास करने के बाद वापस लौट जाते हैं।


डिक्लोफेनेक प्रतिबंध के बाद सुधरी स्थिति

वन विभाग के अनुसार, गिद्ध मृत पशुओं का मांस खाकर पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखते हैं। पूर्व में पशु उपचार में प्रयुक्त डिक्लोफेनेक दवा के कारण गिद्धों की संख्या में भारी गिरावट आई थी। अब दवा पर प्रतिबंध और सतत संरक्षण प्रयासों के कारण उनकी संख्या में लगातार वृद्धि देखी जा रही है।

गणना अभियान में वन विभाग के अधिकारी, रेंजर, विशेषज्ञ, विद्यार्थी एवं वॉलिंटियर्स की सक्रिय भागीदारी रही। विभाग का मानना है कि जनसहभागिता से गिद्ध संरक्षण के प्रति जागरूकता और संवेदनशीलता बढ़ी है, जो भविष्य में इस महत्वपूर्ण प्रजाति के संरक्षण में सहायक सिद्ध होगी।