NEWS: पापी धुंधकारी भी भागवत श्रवण से हुआ मुक्त, सात गांठों ने खोले मन के विकारों के राज, संत कृष्णानंद जी ने सुनाई गोकर्ण-धुंधकारी की कथा, पढ़े खबर
मनासा। उषागंज कॉलोनी स्थित अयोध्यापुरी धर्मशाला के विशाल परिसर में चल रही सात दिवसीय श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के प्रथम दिवस राष्ट्रीय संत डॉ. श्री कृष्णानंद जी गुरुदेव ने आत्मदेव, गोकर्ण और धुंधकारी की कथा के माध्यम से भागवत श्रवण की महिमा का विस्तार से वर्णन किया।
संत श्री ने कथा प्रसंग सुनाते हुए बताया कि तुंगभद्रा नदी के किनारे आत्मदेव नामक ब्राह्मण रहते थे। विद्वान होने के बावजूद संतान नहीं होने के कारण वे अत्यंत दुखी थे। एक समय वे आत्महत्या का विचार लेकर वन की ओर चले गए, जहां उनकी भेंट एक महात्मा से हुई। आत्मदेव ने उनसे संतान प्राप्ति की इच्छा व्यक्त करते हुए कहा कि पुत्र के बिना उन्हें मुक्ति कैसे मिलेगी।
महात्मा ने उन्हें समझाया कि मुक्ति केवल पुत्र से नहीं, बल्कि मनुष्य के अपने कर्मों से मिलती है। पुत्र से नाम रोशन होना निश्चित नहीं है, बल्कि गलत कर्म करने पर वही नाम को डुबो भी सकता है। आत्मदेव महात्मा की बात नहीं माने और उनके द्वारा दिए गए फल के प्रसंग के बाद उनके परिवार में दो संतानों का जन्म हुआ।
कथा में बताया गया कि छोटा पुत्र गोकर्ण विद्वान, ज्ञानी और परोपकारी बना, जबकि धुंधकारी गलत संगति और बुरे कर्मों के कारण चोर, शराबी और अत्याचारी बन गया। धन के लिए उसने अनेक भयानक पाप किए। उसके कुकर्मों के कारण उसका जीवन दुखद अंत तक पहुंचा और मृत्यु के बाद उसे प्रेत योनि प्राप्त हुई।
भाई धुंधकारी को प्रेत योनि से मुक्ति दिलाने के लिए गोकर्ण ने सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया। कथा सुनने के लिए धुंधकारी का प्रेत सात गांठों वाले बांस में बैठकर लगातार सात दिन तक भागवत श्रवण करता रहा। कथा के प्रत्येक दिन बांस की एक गांठ खुलती गई और सातवें दिन सातों गांठें खुल गईं।
संत कृष्णानंद जी ने इन सात गांठों को मनुष्य के भीतर मौजूद काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, मद, मोह आदि विकारों का प्रतीक बताते हुए कहा कि भागवत श्रवण से मनुष्य के भीतर के विकार दूर होते हैं। धुंधकारी जैसा पापी भी भागवत कथा के प्रभाव से प्रेत योनि से मुक्त होकर दिव्य विमान से बैकुंठ धाम चला गया।
संत श्री ने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा मनुष्य के भीतर भक्ति जगाती है, उसे ईश्वर के प्रति जोड़ती है और अंततः मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है। कथा के प्रभाव से पापी व्यक्ति भी अपने जीवन में परिवर्तन की दिशा पा सकता है।
कथा का शुभारंभ प्रथम दिवस कलश यात्रा के समापन के पश्चात हुआ। अयोध्यापुरी धर्मशाला में प्रतिदिन दोपहर 2 बजे से शाम 5:30 बजे तक श्रीमद्भागवत की ज्ञानगंगा प्रवाहित होगी। प्रथम दिवस की कथा का समापन आरती एवं प्रसाद वितरण के साथ हुआ।