BIG NEWS : नागदा नपा की सियासत में फिर भूचाल! हाईकोर्ट की डबल बेंच ने खोला बंद पड़ा कानूनी मोर्चा, अध्यक्ष की कुर्सी पर फिर उठे सवाल, पढ़े बबलू यादव की ये खबर
देरी बनी नहीं ढाल... अध्यक्ष पद को चुनौती देने वाली याचिकाएं फिर बहाल | अंतरिम आदेश भी लौटा, वित्तीय अधिकारों पर रोक बरकरार
नागदा। नगर पालिका नागदा की सियासत में एक बार फिर बड़ा कानूनी मोड़ आ गया है। नपाध्यक्ष संतोष ओमप्रकाश गेहलोत से जुड़े बहुचर्चित मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की डबल बेंच ने ऐसा आदेश दिया है, जिससे करीब चार साल पुराना कानूनी विवाद एक बार फिर सक्रिय हो गया है।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया एवं न्यायमूर्ति आनंद पाठक की खंडपीठ ने उन याचिकाओं को फिर से बहाल कर दिया, जिन्हें पहले केवल देरी के आधार पर खारिज कर दिया गया था। साथ ही पूर्व में जारी अंतरिम आदेश को भी पुनः प्रभावी कर दिया गया है।

चार साल की देरी... फिर भी याचिका खारिज नहीं
मामले में याचिकाकर्ताओं ने नगर पालिका अध्यक्ष के निर्वाचन के बाद मध्यप्रदेश नगरपालिका अधिनियम, 1961 की धारा 45 के तहत आवश्यक अधिसूचना जारी नहीं होने का मुद्दा उठाते हुए अध्यक्ष पद पर बने रहने की वैधानिकता को चुनौती दी थी।
पहले करीब चार वर्ष बाद याचिका दायर किए जाने को आधार बनाकर मामला खारिज कर दिया गया था। अब डबल बेंच ने इस आधार को स्वीकार नहीं किया।

अदालत के आदेश का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यदि किसी व्यक्ति के सार्वजनिक पद पर बने रहने के वैधानिक अधिकार पर ही सवाल उठाया गया हो, तो केवल देरी के आधार पर क्वो वारंटो याचिका को खारिज नहीं किया जा सकता।
यानी अब मामला देरी के सवाल पर खत्म नहीं होगा, बल्कि मूल कानूनी और तथ्यात्मक मुद्दों पर सुनवाई आगे बढ़ेगी।

अंतरिम आदेश बहाल... वित्तीय अधिकारों पर फिर असर
हाईकोर्ट के आदेश के बाद पूर्व अंतरिम व्यवस्था फिर प्रभावी हो गई है। इसका सीधा असर नगर पालिका अध्यक्ष के वित्तीय अधिकारों पर पड़ने की बात सामने आ रही है।
इस स्थिति में नए टेंडर, बड़े भुगतान और वित्तीय स्वीकृतियों से जुड़े मामलों पर असर पड़ सकता है। नियमित भुगतान और कर्मचारियों के वेतन जैसे मामलों में भी प्रशासनिक स्तर पर प्रक्रिया और सक्षम अनुमति की आवश्यकता बढ़ सकती है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, सीएमओ प्रशासनिक अधिकारी के रूप में निर्धारित सीमा तक भुगतान कर सकते हैं, जबकि उससे अधिक राशि के लिए सक्षम स्तर से अनुमति आवश्यक होगी।

अभी कुर्सी का फैसला नहीं... असली लड़ाई अब मेरिट पर
हालांकि हाईकोर्ट ने अभी नपाध्यक्ष के पद को लेकर कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है। याचिकाएं बहाल होने का अर्थ यह नहीं है कि अध्यक्ष पद समाप्त हो गया है।
अब अदालत में मामले की सुनवाई तथ्यों और कानून के आधार पर होगी। इसलिए फिलहाल इसे अंतिम फैसला नहीं, बल्कि लंबे समय से चल रहे कानूनी विवाद के एक नए और महत्वपूर्ण चरण के रूप में देखा जा रहा है।